छुट्टी
छुट्टी
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आज दशहरे की छुट्टी थी सब लोग घर पर थे
और मैं काम पर जा रहा था ।
दवा कम्पनी में नौकरी करता हूं दवा कम्पनियां त्योहारों की
छुट्टियां नहीं देती ।
और छुट्टियों के अलग से पैसा भी नहीं देती।
मेरा पड़ोसी बोला अरे चौरसिया जी ये छुट्टी के दिन भी सुबह-सुबह लंच बॉक्स लेकर कहां चले?
मैं ने कहा जी कुछ जिन्दगियां बचाने
बोले वो कैसे?
मैं ने कहा जी !
मैं एक दवा सप्लाई करने वाली कंपनी में
फिल्ड वर्कर हूं
मेरा काम दुकानों तक अस्पतालों तक
दवाईयां पहुंचाना होता है और
आज के इस बीमार युग में जहां दुनियाभर के
लोग रोटी से ज्यादा दवाईयां खाता हो
और यदि मेरी वजह से किसी के पास
दवाईयां नहीं पहुंचती है और किसी को कुछ हो जाता है तो मुझे बहुत दुःख होगा।
पड़ोसी बोला आपको क्यों दुःख होगा?
मैं ने कहा पिछले दिनों एक अस्पताल में दवाई देने गया
वहां किसी दूसरी दवा एजेंसी से किसी मरीज को दी जाने वाली दवाइयां आनी थी वह समय पर नहीं पहुंचा
तब एक आदमी असमय ईश्वर के पास पहुंच गया
उस दिन कसम खाई
चाहे आंधी बारिश तूफान ही क्यों न आ जाए
मुझे काम पर जाना ही होगा चाहे
इस छुट्टी वाले दिन की सेवा का मूल्य मिले न मिले।
वैसे भी सेवाएं अमूल्य होना ही चाहिए।
©® भुवनेश्वर चौरसिया
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