यथार्थ से आगे कल्पना से परे
यथार्थ से आगे कल्पना से परे ----------------------------------- जिज्ञासु पाठक जो लघुकथा लिखना सीखना चाहता था एक दिन अपनी जिज्ञासा को लेकर अपने प्रिय लेखक के सामने था। कहो वत्स कैसे आना हुआ? अभिवादन की औपचारिकता को पूरा करते हुए ठैं पठैंय अपनी बात रखते हुए अपनी जिज्ञासा को सामने रख दिया जी लघुकथा सीखना चाहता हूॅं। प्रिय लेखक हंसा बहुत कठिन डगर है ये लघुकथा या कुछ भी लिखना खेल नहीं है बच्चों का तेल निकल जाता है अच्छे अच्छों का। लगा जैसे जिज्ञासु पाठक के सामने कोई संगीत का प्रोग्राम होने वाला है। फिर भी धैर्य न खोया।अपनी जिज्ञासा को सामने रख ही दिया। प्रिय लेखक कुछ खाओगे चाय नाश्ता करोगे। जिज्ञासु पाठक का गर्मी से गला सूख रहा था।जी एक गिलास पानी मिलेगा। प्रिय लेखक अभी तो कुछ लिखा ही नहीं सिर्फ पढ़ रहे हो उसमें भी गला सूख रहा है खैर कोई बात नहीं अभी पानी मंगवा दे रहा हूॅं। प्रिय लेखक ने अपनी श्रीमती जी को याद किया अरे ओ......!जरा एक गिलास छाछ मिश्रित पानी लाना कोई पाठक मित्र आया है जो कि मेरी तरह लघुकथा लिखना चाहता है। अपना सा मुंह बनाते हुए अन्दर से आवाज आई जी अभी लाई। इधर बातचीत का क्रम ...