यथार्थ से आगे कल्पना से परे
यथार्थ से आगे कल्पना से परे
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जिज्ञासु पाठक जो लघुकथा लिखना सीखना चाहता था एक दिन अपनी जिज्ञासा को लेकर अपने प्रिय लेखक के सामने था।
कहो वत्स कैसे आना हुआ? अभिवादन की औपचारिकता को पूरा करते हुए ठैं पठैंय अपनी बात रखते हुए अपनी जिज्ञासा को सामने रख दिया जी लघुकथा सीखना चाहता हूॅं।
प्रिय लेखक हंसा बहुत कठिन डगर है ये लघुकथा या कुछ भी लिखना खेल नहीं है बच्चों का तेल निकल जाता है अच्छे अच्छों का।
लगा जैसे जिज्ञासु पाठक के सामने कोई संगीत का प्रोग्राम होने वाला है। फिर भी धैर्य न खोया।अपनी जिज्ञासा को सामने रख ही दिया।
प्रिय लेखक कुछ खाओगे चाय नाश्ता करोगे। जिज्ञासु पाठक का गर्मी से गला सूख रहा था।जी एक गिलास पानी मिलेगा।
प्रिय लेखक अभी तो कुछ लिखा ही नहीं सिर्फ पढ़ रहे हो उसमें भी गला सूख रहा है खैर कोई बात नहीं अभी पानी मंगवा दे रहा हूॅं।
प्रिय लेखक ने अपनी श्रीमती जी को याद किया अरे ओ......!जरा एक गिलास छाछ मिश्रित पानी लाना कोई पाठक मित्र आया है जो कि मेरी तरह लघुकथा लिखना चाहता है। अपना सा मुंह बनाते हुए अन्दर से आवाज आई जी अभी लाई।
इधर बातचीत का क्रम जारी था पानी आधा घंटा तक नहीं आया। पाठक सोच रहा था लगता है आज सप्लाई वालों ने प्रिय लेखक का पानी बंद कर दिया है।
लेखक के हुक्के से गुड़गुड़ाहट की आवाज भी नहीं आ रही थी बस हुक्का सामने रखा था।
पाठक का अनुमान सही था खिंसि निपोड़ते लेखक भाई किया कहूं पिछले कई दिनों से परेशान हूॅं।
नहाए हुए एक सप्ताह हो गया इसलिए इधर कुछ लिख नहीं पाता। लिखता हूॅं तो शरीर का दुर्गंध बाहर आ जाता है और पीने का पानी खरीद कर।
जिज्ञासु पाठक जी कोई बात नहीं पानी मैं खरीद कर पी लूंगा।बस इतना बता दीजिए कि लघुकथा लिखने का कोई मंत्र वंत्र होता है ताकि मंत्रजाप करके शीघ्र अति शीघ्र लघुकथा लेखन सीखा जा सके।
प्रिय लेखक मुस्कुराया और मुस्कुराते हुए बोला अभी पढ़ रहे हो तो सिर्फ पढ़ो लघुकथा अपने आप आ जाएगी।
बीसियों लघुकथा यूट्यूब पर सुन सकते हो इसका एक लाभ कि सिर्फ कान का प्रयोग करना होगा।ललक होगी तो लघुकथा तुम्हारे पास स्वतः आ जाएगी।
अखबार तो आता होगा घर में, अखबार सामने रखते हुए ये देखो आज मेरी प्रिय लघुकथा "छपास प्रवृत्ति"अखबार में प्रकाशित हुई है।
कल ही डाक से लेखकीय प्रति मिला था। मगर अफसोस एक प्रति ही आई नहीं तो मैं तुम्हें भेंट अवश्य करता यादगार के तौर पर, फिलहाल यहीं पढ़ लो।
पसन्द नहीं आया तो आज से ही लिखना छोड़ दूंगा।
अखबार उठाकर पाठक पढ़ने लगा वह भी भूखे प्यासे तभी बाबा बर्फानी प्रकट हुए।
भूखे को अन्न प्यासे को पानी जय बाबा अमरनाथ बर्फानी।
अलख निरंजन जय लघुकथा है लघुकथा।
प्रिय लेखक आओ बाबा आओ आपकी ही प्रतीक्षा थी पता नहीं सुबह सुबह ये पाठक कहां से आ गया कहता है मैं भी आपके जैसा लघुकथा लेखक बनना चाहता हूॅं।
लेकिन ससुरा पढ़ता वढ़ता है नहीं तो लघुकथा लिखना क्या ख़ाक सीखेगा?
लघुकथा यथार्थ से परे और कल्पना के आगे की चीज है। आप तो जानते ही हैं कुल गुरु जो ठहरे लघुकथा के। बाबा बर्फानी चिल्लाए कुल गुरु नहीं सिर्फ गुरु कहो वत्स।
प्रिय लेखक क्षमा गुरूदेव। लेखक ने श्रीमती जी को फिर याद किया अरे ओ फलानी देख तो कौन आया है?
अन्दर से आवाज आई पाठक गया क्या?छाछ मिश्रित स्वच्छ जल बिल्कुल तैयार है ले आऊं। लेखक चिल्लाया जिस लेखक के कथनी और करनी में अंतर नहीं वो भला कैसा लेखक।
बाबा बर्फानी देख बच्चा आज यहीं विश्राम करूंगा तुम्हारे लिए कई लघुकथाएं सीधे कैलाश पर्वत से लेकर आ रहा हूॅं।
प्रिय लेखक लघुकथा लेकर क्या करूंगा बाबा इससे काम नहीं चलता दफ्तर जाना है। काम करना है तभी पैसे आएंगे तभी आपको दान दक्षिणा दे पाऊंगा।
पाठक और बाबा दोनों आश्चर्यचकित लेखक की श्रीमती जी चिल्लाई छाछ मिश्रित जल कलमुंही बिल्ली पलट गई हाय राम अब अतिथि सत्कार कैसे करुंगी मैं।
लेखक की बातों से उब चुके बाबा बर्फानी और पाठक दोनों वहां से अपनी झोली जो कुछ लेने आए थे वहीं रखकर चल दिए।
© भुवनेश्वर चौरसिया "भुनेश"
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