लघुकथा बनाने की विधि
लघुकथा बनाने की विधि
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एक नवतुरिया लेखक लघुकथा लेखन सीखने के लिए गया तो वरिष्ठ लेखक जी ने सलाह दिया पहले लघुकथा पढ़िए तब लिखना स्वत: सीख जाएंगे।
प्रश्न के अनूकूल उत्तर न पाकर उदास लौट आया। कुछ दिन तक शांत बैठा रहा लेकिन इस बीच लघुकथा की बीसियों किताब और पत्र पत्रिकाएं पढ़ डाली पर उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ा तो निश्चय किया कि मैं लघुकथा लिखना नहीं सीखूंगा और न पढूंगा सीधे रिसर्च करके लघुकथा बनाने की विधि इजाद करूंगा ताकि मेरे जैसा अनेक नवतुरिया लेखक लाभान्वित हो और इस तरह एक पंथ दो काज सिद्ध हो। तो वह सोचने लगा इसके लिए क्या- क्या सामग्री चाहिए जिससे एक अच्छी खासी लघुकथा तैयार हो सके। चुकी पहले वह कई लघुकथा पढ़ लिया था और साथ ही लघुकथा लेखन से संबंधित आलेख तो सामग्री का नाम अमूमन याद था।
कांपी कलम लेकर लिखने बैठ गया। तो मित्रो आइए आज हम अपनी रसोई में लघुकथा बनाना सीखेंगे।
एक अच्छी लघुकथा बनाने के लिए सबसे पहले पांच किलो शिल्प लेंगे उसके बाद दस किलो कथ्य उसके बाद बीस किलो भाव लेंगे उसके बाद पचास किलो कथानक लेंगे अरे एक बात तो भूल ही गए।इन सब चीजों को लेने से पहले एक बड़ी कढ़ाई वो भी ढक्कन साथ और उसके लेंगे साथ में एक छलनी और एक छोलनी या पलटा लेंगे। उसके बाद रसोई गैस ओपन करेंगे जिसके ऊपर चूल्हा रखा हो चूल्हे के ऊपर कढ़ाई रखेंगे उसके बाद कथ्य शिल्प भाव और कथानक को कढ़ाई में उबल रहे पानी के अंदर डाल देंगे। उसके बाद उसे पांच छः महीने तक उलट पलट कर उबालते रहेंगे आंच बिल्कुल धीमी रहनी चाहिए आंच तेज हुई तो लघुकथा जल सकती है।
बीच-बीच में दो दो बूंद लघुकथा चखते रहेंगे जिससे पता चलेगा कि फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी। एक बात तो भूल ही गया कम से कम एक मन भाषा चाहिए जिसका चुनाव तो क्या ही नहीं। तो भाइयों इन सब चीजों को एक तरफ रखकर भाषा खरीदने के लिए बाजार जाएंगे। भाषा के लिए भटकते हुए कई दिन बीत गया चुकी अपने देश में तो निज भाषा उन्नति अहै सब भाषा को मूल याद ही नहीं रहा। खैर ढूंढने पर भगवान मिलते हैं तो फिर भाषा कौन सी बड़ी चीज़ है।
लघुकथा करीब करीब पक चुकी थी।बस भाषा का तड़का लगाना शेष रह गया था तो जल्दी जल्दी तड़का भी लगा लिया। लिजिए सबके मिश्रण से लघुकथा तैयार हो गई तो लेखक ने पहली बार लघुकथा को चखकर देखा उसे बहुत अच्छा लगा। वह अभी यह सोच ही रहा था कि सबसे पहले लघुकथा किसे चखने के लिए दूं तभी घर में अफरातफरी मच गई। पहले मैं पहले मैं। लेखक ने परिवार के सभी सदस्यों को मना कर दिया नहीं सबसे पहले मैं अपनी लघुकथा गऊ माता को खिलाऊंगा उसके बाद ही कोई चखेगा। उसने पांच किलो लघुकथा गऊ माता के सामने रख दिया गऊ माता कुछ देर तक सूंघती रही बन्दर जाने अदरक का स्वाद बेचारी हरी घास खाने वाली गऊ माता क्या जाने लघुकथा किस चिड़िया का नाम है। मुंह से दूर हटाकर नाद में पड़ी घास खाने लग गई। लेखक को अंदेशा हुआ शायद गऊ माता को अच्छा नहीं लगा। थक हार कर लघुकथा अपने मित्र को पढ़ने के लिए भेज दिया। और उसके मित्र ने लघुकथा अखबार को भेज दिया और प्रकाशित हो गई। संयोग से जिस लेखक के यहां लघुकथा लेखन सीखने के लिए गया था उसी लेखक के हाथ अखबार लग गई। तस्वीर देखकर वरिष्ठ लेखक को पता चल गया यह लघुकथा उसी की है। जिसे हमने सिखाने से साफ मना कर दिया था। बुझे हुए मन से एक प्रशंसा से भरा हुआ पत्र लिखा प्रिय भाई मुझे माफ़ करना मैं ने तुम्हारी प्रतिभा को पहचाना नहीं तुम तो मुझसे भी अच्छा लिखते हो लिखते रहो मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ है। कुछ दिन बाद पत्र पाकर उसने उस वरिष्ठ लेखक को चिट्ठी लिखा देखिए जी आप अपनी प्रतिभा और शुभकामना अपने पास रखिए मैं तो बस अपने मन में उपजे हुए भावनाओं को व्यक्त करने के लिए दो चार शब्द लिख लेता हूॅं।
© भुवनेश्वर चौरसिया "भुनेश"
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