कल्पना शक्ति
कल्पना शक्ति
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एक बार की बात है एक लेखक की किताब पर पठनोपरांत प्रशंसा करते हुए पाठक ने पत्र लिखा-
"महोदय आपकी लेखनी अप्रतिम है।
प्रशंसनीय है आप अपने अन्दर इतनी सारी कल्पना शक्ति कहां से लाते हैं? जो आप इतनी अच्छी किताबें लिख पाते हैं?"
सोच विचार के उपरांत लेखक ने पाठक को जबावी पत्र लिखा-
आपका पत्र मेरे हाथों में आया, और उसमें निहित प्रशंसा ने मेरे मन को एक क्षण के लिए ठिठकने को बाध्य किया। आपने मेरी लेखनी को अप्रतिम कहा, मेरी कल्पना शक्ति एवं स्रोत की खोज की।
यह प्रश्न, जो सतह पर सरल प्रतीत होता है, मेरे लिए एक गहन आत्म-निरीक्षण का कारण बन गया। आप पूछते हैं कि यह सृजन का स्रोत, यह कथाओं का उद्गम, कहाँ से आता है, जो मेरी पुस्तकों को जीवन देता है? मैं इसका उत्तर देने का प्रयास करता हूँ, पर शायद वह उत्तर उतना रहस्यमय नहीं जितना आप कल्पना करते हैं।
मित्र, मेरे पास कोई अलौकिक शक्ति नहीं, न ही कोई ऐसी जादुई छड़ी जो अनायास ही शब्दों को कागज पर नचाती हो। मेरी लेखनी का रहस्य, यदि इसे रहस्य कहें, मेरे जीवन की उस साधारण किंतु जटिल सत्यता में छिपा है, जो मेरे घर की देहरी पर साँस लेती है। मेरी पत्नी, जिसका नाम ही कल्पना है, मेरी सृजनशीलता का स्रोत वही है—पर वह स्रोत वैसा नहीं जैसा आप सोच रहे होंगे। वह कोई काव्यात्मक प्रेरणा नहीं, जो रात के सन्नाटे में मेरे कानों में गीत गुनगुनाती हो। नहीं, उसका योगदान कहीं अधिक यथार्थपरक, कहीं अधिक मानवीय है।
वह, अपने दैनिक व्यवहार में, मुझे जीवन की उन छोटी-छोटी यातनाओं से परिचित कराती है जो सामान्य प्रतीत होती हैं, किंतु मेरे भीतर एक अजीब बेचैनी जगा देती हैं। उसकी प्रत्येक बात—कभी तिरस्कार, कभी अपेक्षा, कभी अनकहा व्यंग्य—मेरे मन में एक कथा का बीज बो देती है। और मैं, एक लेखक होने के नाते, उस बीज को शब्दों में पिरोता हूँ। मेरी कहानियाँ, मेरे पात्र, मेरे दृश्य—वे सब उस सतत् संनाद का परिणाम हैं जो मेरी पत्नी मेरे जीवन में उत्पन्न करती है।
मैं उसे प्रताड़ना कहूँ, तो शायद यह शब्द कठोर लगे, इसलिए इसे हास्य में समझिए तो ज्यादा अच्छा लगेगा।पर यह एक सत्य है, जो मुझे सृजन की ओर धकेलता है।
आप हँस सकते हैं, मित्र, और शायद हँसना चाहिए भी। क्योंकि सृजन का मार्ग कभी सीधा नहीं होता। वह उन क्षणों में जन्म लेता है जब हम अपने यथार्थ से जूझते हैं, जब हमारी बेचैनी हमें शब्दों में ढलने को मजबूर करती है। मेरी पत्नी, अनजाने में, मुझे वह बेचैनी देती है, और मैं उसे कागज पर उतार देता हूँ। बस, इतना ही है मेरी लेखनी का रहस्य।
प्रिय मित्र, यदि आप मेरी कल्पना शक्ति का स्रोत खोज रहे हैं, तो उसे दूर न तलाशें। वह मेरे निकट है, मेरे घर में, मेरे जीवन की रोजमर्रा की उलझनों में। और शायद, आपके जीवन में भी कोई ऐसी कल्पना हो, जो अनायास ही आपको सृजन की ओर ले जाए।
ऐसी बातें लिखने वाले
भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश' भैया
आज घर जाकर कूटे जाएंगे। फिर फोन करके Ramprasad Rajbhar भैया को अपना दुखड़ा सुनाएंगे।
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